हाथियों से जंग जीतने वाली टीम सड़क पर हार गई, कंटेनर की टक्कर ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल
जंगल में जान जोखिम में डालकर हाथियों को आबादी से दूर भगाने वाली वन विभाग की टीम जब ड्यूटी पूरी कर लौट रही थी, तब मौत ने सड़क पर घेर लिया। पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा से आई टीम आठ दिनों तक रामगढ़ इलाके में हाथियों को खदेड़ने के अभियान में जुटी रही। वापसी में हजारीबाग की ओर बढ़ते समय चरही के पास तेज रफ्तार कंटेनर ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। वाहन में सवार दस लोगों में से चालक शहादत समेत दो की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि आठ गंभीर रूप से घायल हुए। सवाल यह है कि क्या इतनी संवेदनशील ड्यूटी पर निकली टीम के लिए सुरक्षित वाहन और एस्कॉर्ट की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए थी? जंगल में खतरा और सड़क पर लापरवाही—दोनों ने मिलकर दो जिंदगियां ले लीं। यह हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक सतर्कता की कमी का आईना है।
मिशन पूरा, मगर सफर बना काल—वन विभाग की टीम पर टूटी सड़क की मार
रामगढ़ क्षेत्र में हाथियों को आबादी से दूर रखने का मिशन पूरा कर लौट रही टीम को क्या पता था कि उनकी आखिरी परीक्षा सड़क पर होगी। चरही के पास कंटेनर की टक्कर ने उनकी गाड़ी को ऐसा तोड़ा कि मौके पर ही दो सदस्यों की जान चली गई और आठ घायल हो गए। मृतकों में चालक शहादत और टीम का एक अन्य सदस्य शामिल है। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन सवाल अभी जिंदा हैं—क्या भारी वाहनों की रफ्तार पर कोई निगरानी थी? क्या रात या सुबह की इस यात्रा के लिए कोई विशेष सुरक्षा योजना बनाई गई थी? जिस टीम ने गांवों को हाथियों से बचाया, वही टीम खुद सिस्टम की लापरवाही की शिकार बन गई। यह हादसा सिर्फ सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि वन विभाग के अभियानों के बाद सुरक्षित वापसी व्यवस्था की कमी का र्दाफाश है।


