🔴 “बिना बैनर अनाज, सवाल पूछे तो बदसलूकी – क्या अफसर सरकार की साख से खेल रहे हैं?”
सरकारी अनाज की ढुलाई में नियमों की अनदेखी कोई नई बात नहीं, लेकिन जब इस पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों से बदसलूकी हो, तो मामला सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रहता, वह सीधे सरकार की छवि से जुड़ जाता है।
सरायकेला जिले के गम्हरिया क्षेत्र में बिना खाद्य आपूर्ति विभाग का बैनर लगाए 173 बोरी सरकारी अनाज ले जा रहा वाहन पकड़ा गया। स्थानीय पत्रकारों ने जब चालक से वैध दस्तावेज और पहचान चिन्ह को लेकर सवाल किए, तो संबंधित अधिकारियों की भाषा अचानक बदल गई।
नियम कहते हैं कि डोर-स्टेप डिलीवरी में पारदर्शिता जरूरी है, ताकि कालाबाजारी न हो। लेकिन यहां नियम सड़क किनारे पड़े नजर आए। सवाल यह है कि जब पत्रकार सिर्फ व्यवस्था की पोल खोल रहे थे, तो अफसरों को मिर्ची क्यों लगी?
अगर अधिकारी खुद को सरकार से ऊपर समझने लगें, तो नुकसान सिर्फ सिस्टम का नहीं, सीधे सरकार की साख का होता है।
🔴 “अनाज से ज्यादा गर्म हुआ अफसर का तेवर – पत्रकारों पर भड़के, जवाब देने से भागे?”
गम्हरिया क्षेत्र में पकड़ा गया अनाज से लदा वाहन प्रशासन के लिए परीक्षा बन गया है। वाहन पर न बैनर था, न स्पष्ट पहचान, फिर भी उसे सरकारी सप्लाई बताया गया। जब पत्रकारों ने नियमों की याद दिलाई, तो उन्हें जवाब देने के बजाय कथित रूप से बदसलूकी झेलनी पड़ी।
यही नहीं, यह वही इलाका है जहां पहले भी अनाज गोदाम से जुड़े विवाद सामने आ चुके हैं। पुराने प्रभारी की संदिग्ध मौत और भ्रष्टाचार के आरोप आज भी लोगों की यादों में ताजा हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना अधिकारियों की मौन सहमति के ऐसा खेल संभव नहीं। सवाल यह भी है कि अगर सब कुछ सही है, तो अधिकारियों को पारदर्शिता दिखाने में डर क्यों?
अब यह मामला सिर्फ अनाज ढुलाई नहीं, बल्कि प्रशासन और पत्रकारिता की टकराहट का प्रतीक बन गया है।

