🟥 जमशेदपुर में कुत्ते से बच्चों की शादी! अंधविश्वास या आदिवासी परंपरा का अनोखा रहस्य?
जमशेदपुर के शंकोसाई रोड नंबर-5 की बस्ती में मागे पर्व के अंतिम दिन ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने लोगों को चौंका दिया। यहां ‘हरमंगेया’ अनुष्ठान के तहत दो मासूम बच्चों की प्रतीकात्मक शादी एक मादा कुत्ते से कराई गई। समाज के बुजुर्गों का कहना है कि जिन बच्चों के ऊपरी दांत पहले निकल आते हैं, उन पर अशुभ ग्रह का साया होता है। भविष्य में किसी अनहोनी से बचाने के लिए यह विवाह कराया जाता है।
गाजे-बाजे के साथ बारात निकली, हल्दी, मंगनी, समधी मिलन और पांव पूजा की रस्म निभाई गई। विवाह साड़ पेड़ के नीचे कराया गया ताकि ‘ग्रह दोष’ पेड़ में समा जाए। सवाल यह है कि विज्ञान के युग में भी ऐसी परंपराएं क्यों ज़िंदा हैं? क्या यह आस्था है या डर के सहारे चल रही परंपरा? यही इस आयोजन का सबसे बड़ा पर्दाफाश है।
🟥 बच्चों की सुरक्षा या ग्रह-दोष का डर? कुत्ते संग विवाह के पीछे छिपी सच्चाई
शंकोसाई बस्ती में हुए इस अनुष्ठान ने समाज के दो चेहरे दिखा दिए—एक तरफ परंपरा, दूसरी तरफ सवाल। ‘हो’ समाज की मान्यता है कि अगर बच्चे के ऊपर का दांत पहले निकले तो उसे संकट का संकेत माना जाता है। इसी डर को मिटाने के लिए बच्चे का विवाह मादा कुत्ते से कराया जाता है।
बारात पूरे गांव में घुमाई गई, ग्रामीणों ने इसे उत्सव की तरह मनाया। साड़ पेड़ के नीचे विवाह कराने का मतलब यह माना गया कि अशुभ ग्रह पेड़ पर स्थानांतरित हो गया।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस रस्म से सच में बच्चों की सुरक्षा होती है, या यह सिर्फ पीढ़ियों से चला आ रहा मनोवैज्ञानिक भरोसा है? उलीडीह क्षेत्र में 1 मार्च को फिर इसी तरह का आयोजन होने जा रहा है। यह आयोजन अब परंपरा से ज्यादा सामाजिक बहस का मुद्दा बनता जा रहा है।


