🟥 “झूले कम… कमरों की भरमार! टुनटुनिया पार्क या ‘छुपा अड्डा’?”
कांकेबार स्थित टुनटुनिया पार्क इन दिनों चर्चा में है, लेकिन वजह बच्चों की हंसी नहीं बल्कि कथित संदिग्ध गतिविधियाँ हैं। सूत्रों के अनुसार, पार्क परिसर में आधा दर्जन से अधिक कमरे बने हैं, जिन्हें कथित तौर पर जोड़ों को एक हजार रुपये में दो घंटे के लिए दिया जाता है। स्थानीय ग्रामीण तेजपाल महतो और अमित कुमार का आरोप है कि यहां लंबे समय से गलत धंधा चल रहा है, जो किसी भी सभ्य समाज को मंजूर नहीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस जगह को पार्क कहा जाता है, वहां मनोरंजन के नाम पर केवल एक-दो झूले हैं। सवाल उठता है—जब आकर्षण ही नहीं, तो इतनी भीड़ क्यों? ग्रामीणों का कहना है कि इसका असर स्कूली बच्चों पर भी पड़ रहा है। कई बार विरोध हुआ, मगर प्रशासनिक कार्रवाई न के बराबर रही। नतीजा—आसपास के मोहल्लों में रहने वालों का जीना मुहाल हो गया है।
🟥 “पार्क के नाम पर कारोबार? गांव का आरोप—यह जगह अब सामाजिक खतरा”
कांकेबार के टुनटुनिया पार्क को देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह असल में पार्क है। हरियाली और खेलकूद के साधनों की जगह यहां बंद कमरों की कतार नजर आती है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि यह जगह अब खुलेआम गलत गतिविधियों का केंद्र बन चुकी है।
लोगों का सवाल सीधा है—अगर यह पार्क है, तो फिर इतने कमरे क्यों? और अगर कमरे हैं, तो किस मकसद से? ग्रामीण बताते हैं कि यहां रोजाना जोड़ों की भीड़ लगती है, जबकि बच्चों और परिवारों के लिए कोई ठोस सुविधा नहीं। कई बार शिकायतें हुईं, मगर प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल नहीं दिखी।
आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि सामाजिक माहौल बिगड़ रहा है और बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ रहा है। अब गांव की मांग है कि या तो इसे असली पार्क बनाया जाए, या फिर यहां चल रही कथित गतिविधियों पर तुरंत रोक लगे।


